आनुवंशिकी विषयक कुछ तकनीकी शब्द (SOME TECHNICAL TERMS RELATED TO GENETICS)

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आनुवंशिकी विषयक कुछ तकनीकी शब्द

(SOME TECHNICAL TERMS RELATED TO GENETICS)

आनुवंशिकी, मेण्डल के प्रयोग व नियम को पूरी तरह से समझने के लिए कुछ परिभाषाओं, तकनीकों शब्दों या टर्म्स को जानना जरूरी होता है। इनके बिना आनुवंशिकी का अध्ययन सम्भव नहीं है। ये शब्द व

परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

1. गुणसूत्र (Chromosomes ) – गुणसूत्र केन्द्रक के अंदर पायी जाने वाली धागे के समान रचनाएँ हैं। ये रचनाएँ कोशिका में केवल विभाजन के समय दिखायी देती हैं। विश्रामा वस्था (Interphase) में ये उलझे हुए (coiled) धागे के केन्द्रक के अंदर दिखायी देते हैं, जो क्रोमैटिन कहलाते हैं।

रासायनिक रूप से गुणसूत्र प्रोटीन एवं नाभिकीय अम्ल के बने होते हैं। अतः ये न्यूक्लिओप्रोटीन अणु कहलाते हैं। गुणसूत्र नाम सर्वप्रथम वाल्डेयर (Waldeyer) द्वारा सन् 1888 में दिया गया था। अधिकांश जीवों में केन्द्रक के अंदर दो प्रकार के गुणसूत्र पाये जाते हैं (i) ऑटोसोम (Autosome)

(ii) लिंग गुणसूत्र (Sex chromosomes)

ऑटोसोम्स (Autosomes) का जीवों में लिंग निर्धारण से कोई लेना-देना नहीं होता है। जबकि लिंग गुणसूत्र अधिकांश जीवों में लिंग निर्धारण में भाग लेते हैं। जीवों में गुणों की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने वाले जीन्स गुणसूत्र पर व्यवस्थित होते हैं तथा गुणसूत्र के माध्यम से ही ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानान्तरित होते हैं। अतः गुणसूत्र को आनुवंशिक गुणों का वाहक (carrier of heredity) कहा जाता है।

2. जीन (Gene) – आनुवंशिक गुणों की इकाई को जीन कहते हैं। ये गुणसूत्रों के क्रोमोनिमा पर DNA की बनी गाँठों के रूप में पायी जाती हैं। ये आनुवंशिक गुणों को माता-पिता से संतानों में गुणसूत्रों के माध्यम से ले जाती हैं।

3. संकरण (Cross) – किसी जाति के नर एवं मादा को लैंगिक रूप से मिलाने की क्रिया को संकरण कहते हैं, लेकिन जब दो भिन्न गुणों वाले एक ही जाति के सदस्यों या दो भिन्न जाति के नर एवं मादा को लैंगिक रूप से मिलाते हैं, तो इसे हाइब्रिडाइजेशन (Hybridization) कहते हैं।

4. संकर (Hybrid)- जब आनुवंशिक आधार पर दो भिन्न जीवों के बीच संकरण (Cross) कराया जाता है, तो इस क्रिया से उत्पन्न जीव को संकर कहते हैं। जैसे-जब शुद्ध लम्बे और शुद्ध बौने मटर के पौधों के बीच संकरण कराया जाये तो उत्पन्न सन्तान को संकर कहते हैं।

5. इकाई लक्षण (Unit Character) – जीवों के गुण हमेशा जोड़े में पाये जाते हैं जैसे-मटर के लाल एवं सफेद पुष्प का गुण । मेण्डल के अनुसार, ये गुण एक जोड़े कारकों के द्वारा व्यक्त किये जाते हैं। एक जोड़े के कारकों को विकल्प कहते हैं। गुणों या लक्षणों के विपरीत या समान जोड़े को इकाई लक्षण कहते हैं। प्रत्येक जोड़े के गुण समान विकल्पी या विपरीत विकल्पी (Tt) हो सकते हैं।

6. एलील या युग्मविकल्पी या ऐलीलोमॉर्फ (Alleles of allelomorph)-बेटसन तथा सानडसँ (Bateson and Saunders, 1902) ने सबसे पहले ऐलील शब्द को प्रयोग किया। एक ही गुण के दो विभिन्न पर्यायी रूपों को व्यक्त करने वाले कारकों को एक-दूसरे का ऐलील या ऐलीलोमार्फ या युग्मविकल्पी कहते हैं।

जैसे-लम्बेपन तथा बौनेपन को व्यक्त करने वाले दोनों कारक ‘T” और एक-दूसरे के ऐलील या युग्मविकल्पी होंगे। शुद्ध लम्बे (TT) या शुद्ध बौने  पौधों में एक ही प्रकार के युग्मविकल्पी होते हैं, जबकि लम्बे संकर (TL) में दोनों प्रकार के युग्मविकल्पी होते हैं, यह युग्मविकल्पी शब्द युगल कारक में से किसी एक कारक को इंगित करता है। मेण्डेलियन सिद्धांतों के अनुसार किसी भी लक्षण के प्रत्येक विकल्प के लिये एक कारक होता है।

इस तरह किसी लक्षण के दोनों वैकल्पिकों के युगल कारक दो पृथक गुणसूत्रों पर संगत स्थिति (Corresponding loci) पर स्थापित होते हैं। मेण्डल के उदाहरणों के अनुसार T युगल में से “T” एक गुणसूत्र पर तथा दूसरे गुणसूत्र पर स्थित होते हैं और इनमें से प्रत्येक एक-दूसरे का युग्म विकल्पी माना जाता है। इस प्रकार एक ही लक्षण के दो विकल्पिकों को दर्शाने तथा समजात गुणसूत्रों के संगत स्थितियों पर स्थापित कारकों के युगल को युग्मबिकल्पी (Alletes or allelomorphs) कहते हैं।

(7) समयुग्मजी या होमोजायगस और विषमयुग्मजी हेटरोजायगस (Homozygous and Heterozygous)—जब एक ग्रुप को व्यक्त करने वाले दोनों कारक या ऐलील या ऐलीलोमॉर्फ या युग्मविकल्पी एक समान हों जैसे – TT और 1 हों तब इस अवस्था को समयुग्मजी (Homozygous) कहते हैं, लेकिन जब एक जोड़े युग्मविकल्पियों के दोनों कारक अलग-अलग हों, तब इस अवस्था को विषमयुग्मजी (Heterozygous) अवस्था कहते हैं जैसे- T अवस्था ।

(8) प्रभावी एवं अप्रभावी (Dominant and recessive)- इस शब्द का प्रयोग मेण्डल ने अपने कार्य के दौरान प्रारम्भ किया था। जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया जा चुका है, प्रत्येक विषमयुग्मज में दो विपर्यायी कारक होते हैं और इस जनक से उत्पन्न F,-सन्तति में दो कारकों में से केवल एक ही स्वयं को अभिव्यक्त कर पाता है। तथा दूसरा दबा या छिपा रहता है। इस प्रकार F, संकर में स्वयं को अभिव्यक्ति करने वाले कारक को प्रभावी कारक (Dominant factor) तथा दूसरे कारक को अप्रभावी कारक (Recessive factor) कहते हैं। यह अप्रभावी कारक प्रभावी कारक की उपस्थिति के कारण स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर पाता। यहाँ पर यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अप्रभावी कारक अभिव्यक्त न होने के कारण समाप्त या नष्ट नहीं होता, बल्कि बिना किसी परिवर्तन के अगली पीढ़ी या पीढ़ियों में स्थानान्तरित होता रहता है। बने तो ऐसे पौधे को शुद्ध पौधा तथा इसके बीज को शुद्ध बीज एवं इस वंशानुक्रम को शुद्ध वंशानुक्रम कहते हैं।

(9) शुद्ध बीज (Pure seed)- जब किसी पौधे में स्व-परागण कराने पर हमेशा जनकों जैसा हो पौधा युद्ध पौधे में समयुग्मकी लक्षण पाये जाते हैं। (10) व्युत्क्रम संकरण (Reciprocal cross) – ऐसा संकरण जिसमें एक ही प्रभेद (Strain) दूसरे लिंग द्वारा व्यक्त किया B से दूसरा उदाहरण पहले का व्युत्क्रम क्रॉस है। इन संकरणों में सन्ततियाँ (Offsprings) दोनों उदाहरणों में उदाहरण- (1) मादा विभेद (Strain) A से x नर विभेद B से अथवा (2) नर विभेद A से x मादा विभेद जावे जो कि प्रथम संकरण के विपरीत हो, व्युत्क्रम संकरण कहलाता है। एक समान होंगी। इस क्रॉस से यह पता लगता है कि जीनों द्वारा व्यक्त गुण महत्वपूर्ण हैं, चाहे वह किसी भी लिंग आश्रित हों, उससे अन्तर नहीं पड़ता।

 

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